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कर्ण पर्व
अध्याय १२
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सञ्जय़ उवाच
तैराहतौ सर्वमनुष्यमुख्या; वसृक्क्षरन्तौ धनदेन्द्रकल्पौ |  ६६   क
समाप्तविद्येन यथाभिभूतौ; हतौ स्विदेतौ किमु मेनिरेऽन्ये ||  ६६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति