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कर्ण पर्व
अध्याय १२
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सञ्जय़ उवाच
आवृत्य नेय़ेष पुनस्तु युद्धं; पार्थेन सार्धं मतिमान्विमृश्य |  ६९   क
जानञ्जय़ं निय़तं वृष्णिवीरे; धनञ्जय़े चाङ्गिरसां वरिष्ठः ||  ६९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति