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द्रोण पर्व
अध्याय ८६
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सञ्जय़ उवाच
मय़ि चाप्यपय़ाते वै गच्छमानेऽर्जुनं प्रति |  ३४   क
द्रोणे चित्रास्त्रतां सङ्ख्ये राजंस्त्वमनुचिन्तय़ ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति