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शल्य पर्व
अध्याय १२
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽपरेण भल्लेन धर्मपुत्रस्य मारिष |  १४   क
धनुश्चिच्छेद समरे सज्यं स सुमहारथः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति