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शल्य पर्व
अध्याय १२
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सञ्जय़ उवाच
तस्य धर्मसुतो राजन्क्षुरप्रेण महाहवे |  ३२   क
चक्ररक्षं जघानाशु मद्रराजस्य पार्थिव ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति