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शल्य पर्व
अध्याय १२
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सञ्जय़ उवाच
समाच्छन्नांस्ततस्तांस्तु राजन्वीक्ष्य स सैनिकान् |  ३४   क
चिन्तय़ामास समरे धर्मराजो युधिष्ठिरः ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति