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शल्य पर्व
अध्याय १२
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सञ्जय़ उवाच
स तु तान्सर्वतो यत्ताञ्शरैः सम्पीड्य मारिष |  ४३   क
धर्मराजमवच्छाद्य सिंहवद्व्यनदन्मुहुः ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति