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शान्ति पर्व
अध्याय २९३
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वसिष्ठ उवाच
कलाय़ां जाय़तेऽजस्रं पुनः पुनरवुद्धिमान् |  ५   क
धाम तस्योपय़ुञ्जन्ति भूय़ एव तु जाय़ते ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति