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आदि पर्व
अध्याय १२०
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जनमेजय़ उवाच
कृपस्यापि महाव्रह्मन्सम्भवं वक्तुमर्हसि |  १   क
शरस्तम्भात्कथं जज्ञे कथं चास्त्राण्यवाप्तवान् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति