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आदि पर्व
अध्याय १२३
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो निषादराजस्य हिरण्यधनुषः सुतः |  १०   क
एकलव्यो महाराज द्रोणमभ्याजगाम ह ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति