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आदि पर्व
अध्याय ११४
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वैशम्पाय़न उवाच
जाते वृकोदरे पाण्डुरिदं भूय़ोऽन्वचिन्तय़त् |  १५   क
कथं नु मे वरः पुत्रो लोकश्रेष्ठो भवेदिति ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति