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शान्ति पर्व
अध्याय १२०
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भीष्म उवाच
अप्यदृष्ट्वा निय़ुक्तानि अनुरूपेषु कर्मसु |  २२   क
सर्वांस्ताननुवर्तेत स्वरांस्तन्त्रीरिवाय़ता ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति