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शान्ति पर्व
अध्याय ५१
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वासुदेव उवाच
यतः खलु परा भक्तिर्मय़ि ते पुरुषर्षभ |  १०   क
ततो वपुर्मय़ा दिव्यं तव राजन्प्रदर्शितम् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति