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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
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वैशम्पाय़न उवाच
अहो गूढतमः प्रश्नस्त्वय़ा पृष्टो जनेश्वर |  १४   क
नातप्ततपसा ह्येष नावेदविदुषा तथा |  १४   ख
नापुराणविदा चापि शक्यो व्याहर्तुमञ्जसा ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति