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शान्ति पर्व
अध्याय ३००
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याज्ञवल्क्य उवाच
मनो ग्रसति सर्वात्मा सोऽहङ्कारः प्रजापतिः |  १२   क
अहङ्कारं महानात्मा भूतभव्यभविष्यवित् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति