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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
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जनमेजय़ उवाच
कथं स भगवान्देवो यज्ञेष्वग्रहरः प्रभुः |  १   क
यज्ञधारी च सततं वेदवेदाङ्गवित्तथा ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति