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शान्ति पर्व
अध्याय १२०
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भीष्म उवाच
विद्या तपो वा विपुलं धनं वा; सर्वमेतद्व्यवसाय़ेन शक्यम् |  ४३   क
व्रह्म यत्तं निवसति देहवत्सु; तस्माद्विद्याद्व्यवसाय़ं प्रभूतम् ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति