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शान्ति पर्व
अध्याय १२०
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भीष्म उवाच
यत्रासते मतिमन्तो मनस्विनः; शक्रो विष्णुर्यत्र सरस्वती च |  ४४   क
वसन्ति भूतानि च यत्र नित्यं; तस्माद्विद्वान्नावमन्येत देहम् ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति