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शान्ति पर्व
अध्याय १२०
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भीष्म उवाच
पश्येदुपाय़ान्विविधैः क्रिय़ापथै; र्न चानुपाय़ेन मतिं निवेशय़ेत् |  ५२   क
श्रिय़ं विशिष्टां विपुलं यशो धनं; न दोषदर्शी पुरुषः समश्नुते ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति