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अनुशासन पर्व
अध्याय १२०
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व्यास उवाच
आत्मवान्भव सुप्रीतः स्वधर्मचरणे रतः |  ५   क
क्षात्रीं तनुं समुत्सृज्य ततो विप्रत्वमेष्यसि ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति