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वन पर्व
अध्याय १२०
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सात्यकिरु उवाच
प्रद्युम्नमुक्तान्निशितान्न शक्ताः; सोढुं कृपद्रोणविकर्णकर्णाः |  ११   क
जानामि वीर्यं च तवात्मजस्य; कार्ष्णिर्भवत्येष यथा रणस्थः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति