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शान्ति पर्व
अध्याय २२१
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श्रीरु उवाच
अमर्षणा न चान्योन्यं स्पृहय़न्ति कदाचन |  ३२   क
न च जातूपतप्यन्ते धीराः परसमृद्धिभिः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति