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वन पर्व
अध्याय १२०
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वासुदेव उवाच
यदा तु पाञ्चालपतिर्महात्मा; सकेकय़श्चेदिपतिर्वय़ं च |  २५   क
योत्स्याम विक्रम्य परांस्तदा वै; सुय़ोधनस्त्यक्ष्यति जीवलोकम् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति