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वन पर्व
अध्याय १२०
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वैशम्पाय़न उवाच
विसृज्य कृष्णं त्वथ धर्मराजो; विदर्भराजोपचितां सुतीर्थाम् |  ३०   क
सुतेन सोमेन विमिश्रितोदां; ततः पय़ोष्णीं प्रति स ह्युवास ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति