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द्रोण पर्व
अध्याय १२०
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सञ्जय़ उवाच
अल्पावशिष्टं दिवसं नृवीर; विघातय़स्वाद्य रिपुं शरौघैः |  १२   क
दिनक्षय़ं प्राप्य नरप्रवीर; ध्रुवं हि नः कर्ण जय़ो भविष्यति ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति