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द्रोण पर्व
अध्याय १२०
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सञ्जय़ उवाच
रक्षितं मद्रराजेन कृपेण च महात्मना |  १९   क
जय़द्रथं रणमुखे कथं हन्याद्धनञ्जय़ः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति