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द्रोण पर्व
अध्याय १२०
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सञ्जय़ उवाच
स्थातव्यमिति तिष्ठामि रणे सम्प्रति मानद |  २५   क
नैवाङ्गमिङ्गति किञ्चिन्मे सन्तप्तस्य रणेषुभिः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति