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शान्ति पर्व
अध्याय १०५
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भीष्म उवाच
क्षेमदर्शं नृपसुतं यत्र क्षीणवलं पुरा |  ३   क
मुनिः कालकवृक्षीय़ आजगामेति नः श्रुतम् |  ३   ख
तं पप्रच्छोपसङ्गृह्य कृच्छ्रामापदमास्थितः ||  ३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति