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द्रोण पर्व
अध्याय १२०
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सञ्जय़ उवाच
संरव्धाः सैन्धवस्यार्थे समावृण्वन्किरीटिनम् |  ४१   क
नृत्यन्तं रथमार्गेषु धनुर्ज्यातलनिस्वनैः ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति