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द्रोण पर्व
अध्याय १४४
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सञ्जय़ उवाच
तमाचार्यो महाराज विद्ध्वा पञ्चभिराशुगैः |  १७   क
पुनर्विव्याध विंशत्या पुत्राणां प्रिय़कृत्तव ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति