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द्रोण पर्व
अध्याय १२०
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सञ्जय़ उवाच
तं द्रौणिः पञ्चविंशत्या वृषसेनश्च सप्तभिः |  ५२   क
दुर्योधनश्च विंशत्या कर्णशल्यौ त्रिभिस्त्रिभिः ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति