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द्रोण पर्व
अध्याय १२०
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सञ्जय़ उवाच
श्लिष्टं तु सर्वतश्चक्रू रथमण्डलमाशु ते |  ५४   क
सूर्यास्तमय़मिच्छन्तस्त्वरमाणा महारथाः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति