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द्रोण पर्व
अध्याय १२०
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सञ्जय़ उवाच
फल्गुनस्तु महावाहुः कर्णं वैकर्तनं रणे |  ६३   क
साय़कानां शतेनैव सर्वमर्मस्वताडय़त् ||  ६३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति