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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
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वैशम्पाय़न उवाच
यो यथा निर्मितो जन्तुर्यस्मिन्यस्मिंश्च कर्मणि |  ६८   क
प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा तत्फलं सोऽश्नुतेऽवशः ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति