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द्रोण पर्व
अध्याय १२०
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सञ्जय़ उवाच
वधार्थं चास्य समरे साय़कं सूर्यवर्चसम् |  ६६   क
चिक्षेप त्वरय़ा युक्तस्त्वराकाले धनञ्जय़ः ||  ६६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति