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द्रोण पर्व
अध्याय १२०
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सञ्जय़ उवाच
ततो दुर्योधनो राजंस्तावकानभ्यभाषत |  ७३   क
यत्ता रक्षत राधेय़ं नाहत्वा समरेऽर्जुनम् |  ७३   ख
निवर्तिष्यति राधेय़ इति मामुक्तवान्वृषः ||  ७३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति