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द्रोण पर्व
अध्याय १२०
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सञ्जय़ उवाच
सारथिं चास्य भल्लेन रथनीडादपाहरत् |  ७५   क
छादय़ामास च शरैस्तव पुत्रस्य पश्यतः ||  ७५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति