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द्रोण पर्व
अध्याय १२०
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सञ्जय़ उवाच
तथैव तान्प्रत्यविध्यत्कुन्तीपुत्रो धनञ्जय़ः |  ८०   क
द्रोणपुत्रं चतुःषष्ट्या मद्रराजं शतेन च ||  ८०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति