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द्रोण पर्व
अध्याय १२०
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सञ्जय़ उवाच
सैन्धवं दशभिर्भल्लैर्वृषसेनं त्रिभिः शरैः |  ८१   क
शारद्वतं च विंशत्या विद्ध्वा पार्थः समुन्नदत् ||  ८१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति