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द्रोण पर्व
अध्याय १२०
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सञ्जय़ उवाच
ततस्तु तस्मिंस्तुमुले समुत्थिते; सुदारुणे भारत मोहनीय़े |  ८४   क
नामुह्यत प्राप्य स राजपुत्रः; किरीटमाली विसृजन्पृषत्कान् ||  ८४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति