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द्रोण पर्व
अध्याय १२०
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सञ्जय़ उवाच
किरीटमाली महता महाय़शाः; शरासनेनास्य शराननीकजित् |  ८७   क
हय़प्रवेकोत्तमनागधूर्गता; न्कुरुप्रवीरानिषुभिर्न्यपातय़त् ||  ८७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति