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शान्ति पर्व
अध्याय २५३
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तुलाधार उवाच
ततः सिद्धस्य तपसा तव विप्र शकुन्तकाः |  ४९   क
क्षिप्रं शिरस्यजाय़न्त ते च सम्भावितास्त्वय़ा ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति