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अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
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व्रह्मो उवाच
न मित्रध्रुङ्नैकृतिकः कृतघ्नः; शठोऽनृजुर्धर्मविद्वेषकश्च |  १४   क
न व्रह्महा मनसापि प्रपश्ये; द्गवां लोकं पुण्यकृतां निवासम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति