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शान्ति पर्व
अध्याय १२१
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भीष्म उवाच
धर्मस्याख्या महाराज व्यवहार इतीष्यते |  ९   क
तस्य लोपः कथं न स्याल्लोकेष्ववहितात्मनः |  ९   ख
इत्यर्थं व्यवहारस्य व्यवहारत्वमिष्यते ||  ९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति