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अनुशासन पर्व
अध्याय १२१
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व्यास उवाच
अधिकं मार्जनात्तात तथैवाप्यनुलेपनात् |  १४   क
शुभं सर्वपवित्रेभ्यो दानमेव परं भवेत् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति