वन पर्व  अध्याय २८४

कर्ण उवाच

प्राप्स्यामि परमं लोके यशः स्वर्भानुसूदन |  ३८   क
जीवितेनापि मे रक्ष्या कीर्तिस्तद्विद्धि मे व्रतम् ||  ३८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति