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वन पर्व
अध्याय १२१
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वैशम्पाय़न उवाच
यथाय़ोगं यथाप्रीति प्रय़यौ भ्रातृभिः सह |  १७   क
ददमानोऽसकृद्वित्तं व्राह्मणेभ्यः सहस्रशः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति