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द्रोण पर्व
अध्याय १२१
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सञ्जय़ उवाच
स रणे व्यचरत्पार्थः प्रेक्षणीय़ो धनञ्जय़ः |  १   क
युगपद्दिक्षु सर्वासु चित्राण्यस्त्राणि दर्शय़न् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति