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द्रोण पर्व
अध्याय १२१
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सञ्जय़ उवाच
स विक्षिप्यार्जुनस्तीक्ष्णान्सैन्धवप्रेषिताञ्शरान् |  १३   क
युगपत्तस्य चिच्छेद शराभ्यां सैन्धवस्य ह |  १३   ख
सारथेश्च शिरः काय़ाद्ध्वजं च समलङ्कृतम् ||  १३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति