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द्रोण पर्व
अध्याय १२१
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सञ्जय़ उवाच
तवात्मजोऽय़ं मर्त्येषु कुलशीलदमादिभिः |  १९   क
गुणैर्भविष्यति विभो सदृशो वंशय़ोर्द्वय़ोः |  १९   ख
क्षत्रिय़प्रवरो लोके नित्यं शूराभिसत्कृतः ||  १९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति