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द्रोण पर्व
अध्याय १२१
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सञ्जय़ उवाच
कृतजप्यस्य तस्याथ वृद्धक्षत्रस्य धीमतः |  ३८   क
उत्तिष्ठतस्तत्सहसा शिरोऽगच्छद्धरातलम् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति