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द्रोण पर्व
अध्याय १२१
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सञ्जय़ उवाच
पाण्डवास्तु जय़ं लव्ध्वा सैन्धवं विनिहत्य च |  ४७   क
अय़ोधय़ंस्ततो द्रोणं जय़ोन्मत्तास्ततस्ततः ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति